Power Of Silence | Gautam Buddha Ki Kahani
Power Of Silence | Gautam Buddha Ki Kahani | गौतम बुद्ध की शिक्षाप्रद कहानी
दोस्तो आज की कहानी है गौतम बुद्ध की शिक्षाप्रद कहानी , सारा खेल विचारों का है अगर मनुष्य अपने विचारों पर नियंत्रण करना सीख ले तो वह जो चाहे वह बन सकता है जितने भी सफल व्यक्ति हुए हैं उन सब ने अपने अंदर सकारात्मक विचार भरे हैं और वह अच्छाई के मार्ग पर चलकर ही सफल बन पाए हैं एसी सिख गौतम बुद्ध ने कई सालों पहले उस वक्त की पीढ़ी को क्यों दी थी इसके पीछे का रहस्य क्या है आज इसी रहस्य के बारे में हम गौतम बुद्ध की कहानियों के माध्यम से जानेंगे तो बिना देर किए चलिए उन कहानियों की शुरुआत करते हैं पहली कहानी विचारों पर एक बुद्ध कहानी।
Gautam Buddha Ki Kahani | गौतम बुद्ध की शिक्षाप्रद कहानी .
आश्रम के सभी बच्चे जब दूसरे कामों में लगे होते थे तो एक बच्चा एक कोने में बैठा चुपचाप अपने आप में खोया रहता था वह अक्सर किसी से ज्यादा बातें नहीं किया करता था आश्रम की सभी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद जहां सभी बच्चे पूरे दिन की घटनाओं की चर्चा करने लगते।
वहीं पर वह शांत रहने वाला बच्चा एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर ध्यान करने लगता सभी बच्चों को आश्चर्य होता था क्योंकि उसका कोई दोस्त नहीं था वह अक्सर आश्रम में अकेला ही घूमता रहता था यह देखकर उसके गुरु को बड़ी प्रसन्नता होती थी।
उन्हें लगता था कि कोई तो है आश्रम में जो मौन यानी कि चुप रहने की ताकत को समझता है उसके महत्व को समझता है आश्रम के बारे में जब भी कोई जरूरी निर्णय लेना होता उसकी राय जरूर लिया करते थे लेकिन यही बात गुरु जी के एक शिष्य को बड़ी खटकती थी।
क्योंकि वह गुरु जी का प्रिय शिष्य बनना चाहता था इसलिए वह गुरु जी के सामने दूसरे बच्च के कामों में कुछ ना कुछ कमियां निकालता रहता था जिससे गुरुजी उसे महान समझने लग जाए अक्सर वह अपनी जिम्मेदारियां पूरी तरीके से निभाने का दिखावा भी करता चाहे उससे कोई भी सलाह ना मांगे लेकिन फिर भी वह उन्हें अपनी सलाह देता रहता था।
वह बहुत ही बातूनी शिष्य था और आश्रम के दूसरे सभी बच्चों में बहुत प्रसिद्ध भी था क्योंकि वह सबसे हंसी मजाक करता रहता था उनसे दिन भर बातें करता रहता था इसलिए उसके सबसे दोस्ती हो गई थी लेकिन जब आश्रम के गुरु उसकी राय ना लेकर दूसरे बच्चे की राय लेते थे तो यह बात उसे बड़ी खटकती थी उसे यह लगता था कि वह उस दूसरे बच्चे से ज्यादा बुद्धिमान है।
लेकिन गुरुजी फिर भी उसकी तरफदारी करते हैं ऐसा नहीं था कि गुरुजी को बातूनी शिष्य के स्वभाव के बारे में पता नहीं था लेकिन गुरुजी उसे अपने तरीके से सीख देना चाहते थे ताकि उसकी ज्यादा बोलने की आदत दिखावा करने की आदत दूसरे में कमियां निकालने की आदत हमेशा के लिए खत्म हो जाए और वह मौन रहकर ध्यान की गहराइयों को छू पाए असल में हर सच्चे गुरु की यह इच्छा होती है ।
वह किसी तरीके से उस बातूनी शिष्य को एहसास कराना चाहते थे कि चुप रहने सेही उसे असीम सत्य को जाना जा सकता है उस विराट का एहसास चुप होकर ही किया जा सकता है एक दिन गुरु जी को एक तरीका सूझा उन्होंने।
आश्रम के सभी बच्चों को अपने पास बुलाया और कहा मैं तुम सभी को दोदो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग गांवों में भिक्षा मांगने के लिए भेज रहा हूं और जो भी दो बच्चे सबसे ज्यादा भिक्षा मांग कर लाएंगे उन दोनों को आश्रम की सभी जिम्मेदारियां निभाने का मौका दिया जाएगा ।
अपनी बात जारी रखते हुए गुरु जी ने कहा भिक्षा मांगने से हमारा अहंकार खत्म होता है इसलिए हर शिष्य पूरे मन से भिक्षा मांगे कोई भी इस काम को औपचारिकता में ना ले वरना वह हमारे जीवन का बहुत बड़ा ज्ञान खो देंगे आश्रम के गुरुजी ने जानबूझकर बातूनी शिष्य और चुप रहने वाले शिष्य की जोड़ी बना दी बातूनी शिष्य के मन में सिर्फ एक ही बात चल रही थी कि इस बार उसे मौका मिला है और इस बार वह गुरुजी को दिखा देगा कि वह चुप रहने वाले शिष्य से कितना ज्यादा प्रतिभावान है।
दोनों शिष्यों ने आपस में सहमति से निर्णय लिया कि गांव की अलग-अलग जगह से भिक्षा मांगना शुरू करेंगे ताकि भिक्षा मांगने का काम जल्दी खत्म किया जा सके चुप रहने वाला शिष्य हर द्वार पर जाकर अपने हाथ जोड़कर अपना भिक्षा का पात्र उनके सामने कर देता उसके चेहरे पर एक सादगी और उसकी आंखों में एक एकांत होता था जिससे भिक्षा देने वाले उसे भिक्षा देकर अपने आप को अनुग्रहित समझते थे।
वहीं पर दूसरा बातूनी शिष्य हर द्वार पर जाकर उनको कुछ ना कुछ ज्ञान देने लगता था जिससे ज्यादातर लोग उसे भिक्षा दिए बिना ही लौटा देते थे पूरे गांव में भिक्षा मांगकर जब दोनों गांव के बीच में मिले तो बातूनी शिष्य ने देखा कि चुप रहने वाले शिष्य के पास उससे दुगनी भिक्षा थी यह देखकर उसे मन ही मन बहुत ठेस पहुंचा।
लेकिन जब व दोनों भिक्षा का सामान लेकर आश्रम की तरफ जा रहे थे तब बातूनी शिष्य को एक चालाकी सूझी उसने चुप रहने वाले शिष्य से कहा हमें अपनी भिक्षा एक ही थैले में डाल लेनी चाहिए गुरु जी ने हम दोनों को एक साथ भिक्षा लाने के लिए कहा था चुप रहने वाले शिष्य ने बिना कुछ बोले अपनी सारी भिक्षा उसके थैले में डाल दी।
बातूनी शिष्य मन ही मन बहुत खुश हो रहा था कि अब गुरु जी को यह पता नहीं चलेगा कि ज्यादा भिक्षा हम में से किसने मांगी उसे लग रहा था कि गुरु जी मुझे इससे कम प्रतिभावान समझेंगे इसलिए उसने यह तरकीब लगाई सभी शिष्यों के आने के बाद संध्या के समय जब सभी की भिक्षा ली गई तो इन दोनों शिष्यों की भिक्षा सबसे ज्यादा निकली।
गुरुजी ने इन दोनों बच्चों का अभिवादन करते हुए आश्रम के सभी बच्चों के सामने उनकी पीठ थपथपाते हुए मुबारकबाद दी और कहा मैं आश्रम का कार्यभार तुम दोनों को नहीं सौंप सकता इससे आपसी मतभेद होने का खतरा रहता है इसलिए तुम दोनों में से जो ज्यादा भिक्षा लेकर आया है।
आश्रम की जिम्मेदारियां उसे ही सौंपी जाएंगी जब उन्होंने पूछा कि तुम में से ज्यादा भिक्षा कौन मांग कर लाया है तो बातूनी शिष्य ने कहा गुरु जी मैं इससे दो गुने भिक्षा मांग कर लाया था लेकिन मुझसे गलती हो गई कि मैंने वह दोनों भिक्षा एक ही थैले में डाल दी मुझे नहीं पता था कि आप ऐसा निर्णय लेने वाले हैं ।
वरना मैं अपनी भिक्षा का थैला अलग ही रखता इस पर गुरु जी ने चुप रहने वाले शिष्य से पूछा क्या तुम इसकी बात से सहमत हो क्या तुम इससे कम भिक्षा लेकर आए थे यह सुनकर चुप रहने वाले शिष्य ने कहा गुरु जी मेरे पास ऐसा कोई साधन नहीं है जिससे मैं यह साबित कर पाऊं कि मैं इससे ज्यादा भिक्षा लेकर आया था असल में यह उल्टा बोल रहा है दुगनी भिक्षा मैं लेकर आया था।
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| गौतम बुद्ध की शिक्षाप्रद कहानी |
यह मुझसे आधी भिक्षा लेकर आया था इसने ही मुझे भिक्षा एक थैले में डालने की बात कही थी आश्रम से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी थी जिसके पीछे सूरज अभी-अभी संध्या के समय ढल रहा था गुरुजी को पता था कि सच कौन बोल रहा है लेकिन बाकी बच्चों के सामने सच साबित करने के लिए उन्होंने उन दोनों को एक एक सवाल पूछा पीछे पहाड़ी पर तुम्हें क्या दिख रहा है।
यह सुनकर वाचाल शिष्य झट से बोल पड़ा गुरुजी पहाड़ी के पीछे सूरज अपना रंग बिखेर रहा है आसमान में लाली मां छाई हुई है यह बहुत ही सुंदर दृश्य है वो तो और भी बहुत कुछ कहना चाहता था लेकिन गुरु जी ने उसे चुप करते हुए दूसरे शिष्य से जवाब जानने के लिए जब उसकी तरफ देखा तो उसकी आंखों में आंसू भर गए थे।
श्रद्धा भक्ति और प्रेम से उसकी आंखें भर आई थी गुरु जी को उससे पूछने की जरूरत नहीं पड़ी गुरु जी ने सभी बच्चों को संबोधित करते हुए कहा मैंने सवाल किया था कि पहाड़ी के पीछे तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है ज्यादातर लोगों को यह दिखाई देगा कि यह बहुत सुंदर दृश्य है ।
लेकिन मजे की बात यह है कि सुंदरता बोलक नहीं बताई जा सकती उसे महसूस किया जा सकता है और सामने वाला उस सुंदरता को आपकी आंखों में देख पाता है चुप रहने वाले शिष्य की तरफ इशारा करते हुए गुरु जी ने कहा असल में सुंदरता इस बच्चे ने देखी है दूसरे बच्चे ने सिर्फ सुंदरता की व्याख्या की है लेकिन इसने वास्तविकता में उस सुंदरता को महसूस किया है।
अपने ऊंचा दिखाने की सभी कोशिशें नाकाम होती वाचाल शिष्य वहीं पर फूट फूट कर रोने लगा उसको चुप कराते हुए गुरु जी ने कहा बेटा मुझे पहले यह पता था कि तुम झूठ बोल रहे हो लेकिन मैं तुम्हें उस झूठ का एहसास कराना चाहता था सभी बच्चों को संबोधित करते हुए गुरु जी ने बताया शब्द एक जाल की तरह होते हैं हमारे ज्यादा बोलने की वजह से बहुत सारी समस्या पैदा होती है।
जब कोई एक आदमी बात को बढ़ा चढ़ा कर बोल देता है तो उसे सिद्ध करने के लिए वह दो शब्द के जाल में फसता जाता है इसी वजह से अंतर्मुखी होने की बजाय वह बहिर्मुखी होता चला जाता है वहीं पर जिस व्यक्ति को अपनी अंतर यात्रा करनी होती है उसे सबसे पहले चुप रहना सीखना होता है।
जरूरत से ज्यादा बोलना या फिर हर वक्त बोलते ही रहना यह सब हमारी अंतर यात्रा में बाधा बन जाता है जब आप चुप रहने का अभ्यास करते हैं तो आप अपने साथ वक्त बिताने लगते हैं इससे आप अपने एकांत को जान पाते हैं और एक बार अगर मन एकांत में स्थापित हो जाता है तो आपकी आंखों में आपके चेहरे में वह सादगी व एकांत वह स्पष्टता झलक लगती है।
सब कुछ स्पष्ट नजर आने लगता है कुछ साबित करने को नहीं रह जाता कुछ बताने को नहीं रह जाता सब कुछ आंखों में देखा जा सकता है चुप रहने वाले शिष्य की तरफ इशारा करते हुए गुरु जी ने कहा अभी जो दृश्य इस बच्चे ने देखा वह ज्यादा बोलने वाला आदमी कभी नहीं देख पाएगा वह अपनी बुद्धि से तर्क वितर्क करता रहेगा कि उसे क्या-क्या दिखाई दे रहा है।
लेकिन उन दृश्यों को वह कभी महसूस नहीं कर पाएगा अगर चुप रहने की कला सीखनी है तो तुम्हें सबसे पहले एक बात का ध्यान रखना होगा कि तुम्हें किसी को भी प्रभावित करने की कोशिश नहीं करनी है ज्यादातर लोग इसी वजह से ज्यादा बोलते हैं कि वह दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं अपने आप को साबित करना चाहते और उस साबित करने के चक्कर में वह शब्दों के जाल में फंसते चले जाते हैं।
धीरे-धीरे वही उनकी आदत बन जाती है अगर कोई व्यक्ति दूसरों को प्रभावित करना चाहता है तो वह कितने लोगों को प्रभावित कर पाएगा उसकी यह भूख बढ़ती जाएगी वही संसार में सभी को कभी भी प्रभावित नहीं कर पाएगा इसलिए यह समझने की बात है कि बहिर्मुखी होने की बजाय हम अंतर्मुखी होकर अपने आप को समझ सकते हैं।
अपने बातों को खत्म करते हुए गुरुजी ने अपना आखिरी संदेश दिया उन्होंने बताया कि अगर कोई व्यक्ति ज्यादा समय तक चुप नहीं रह सकता तो उसे थोड़े समय से अभ्यास करना चाहिए एक दिन में कुछ घंटे चुप रहने का अभ्यास करो धीरे-धीरे यह आदत खुद बखुदा पनपने लगती है क्योंकि एक बार जब हम चुप रहने लगते हैं तो हमें चुप रहने का आनंद पता चल जाता है।
उसके बाद हमें प्रयास नहीं करना पड़ता बल्कि हमारा मन आनंद की तरफ अपने आप बढ़ता चला जाता है चुप रहने की कला सीखने के बाद आपकी बुद्धिमानी और आपकी स्पष्टता दोनों में बहुत ज्यादा फायदा होगा वास्तविकता में जिसे दर्शन कहते हैं वह मौन रहकर ही किया जा सकता है।
इसके बाद सभी बच्चों से कुछ समय चुप रहने का संकल्प लेकर गुरुजी ने अपनी बात खत्म कर दी और सभी बच्चे रात्रि का भोजन करने के लिए एक साथ भोजन कक्ष में पहुंच गए इसलिए कहा जाता है दोस्तों ज्यादा बोलोगे तो फसो ग इसलिए कम बोलना सीखो क्योंकि कम बोलकर ही आप अपने भीतर के मन को जान सकते हो आप क्या हो यह पहचान सकते हो ।
दोस्तों यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट सेक्शन में जरूर बताइएगा तो मिलते हैं किसी अगली कहानी में तब तक के लिए अपना ख्याल रखिए और खुश रहिए धन्यवाद .

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